Skip to content

पाठ 19

19.1. आसन्न वाक्य (Relative Clause)

संरचना:

आसन्न सर्वनाम -- आसन्न वाक्य, जिसमें वह संज्ञा होती है जिसके संबंध में आसन्न वाक्य का प्रयोग होता है -- (प्रदर्शक सर्वनाम) -- मुख्य वाक्य

आसन्न वाक्य मुख्य वाक्य के बाद भी आ सकता है, लेकिन उसे मुख्य वाक्य में नहीं रखा जा सकता।

आसन्न सर्वनाम और संबंध शब्द, जो जर्मन के विपरीत आसन्न वाक्य में होता है, उस कारक में होते हैं जो आसन्न वाक्य व्याकरणिक रूप से आवश्यक करता है। प्रदर्शक सर्वनाम उस कारक में होता है जो मुख्य वाक्य व्याकरणिक रूप से आवश्यक करता है।

उदाहरण:

टिप्पणी: सामान्य सत्य वाले आसन्न वाक्यों में इंडिकेटिव के स्थान पर ऑप्टेटिव का प्रयोग करने की प्रवृत्ति होती है। अतः हमारे कई उदाहरणों में ऑप्टेटिव का प्रयोग प्राथमिकता प्राप्त करता है।

1. वाक्य का कर्ता (⟪कर्तृ⟫) आसन्न वाक्य द्वारा अधिक स्पष्ट किया जाता है:

⟪यो⟪नरः⟪पुण्यं⟪करोति⟪स⟪स्वर्गं⟪गच्छति⟫ = ⟪यो⟪नरः⟪पुण्यं⟪करोति⟪तेन⟪स्वर्गं⟪गम्यते⟫ = ⟪येन⟪नरेण⟪पुण्यम्⟪क्रियते⟪तेन⟪स्वर्गं⟪गम्यते⟫ आदि = "कर्म करने वाला पुरुष स्वर्ग को प्राप्त होता है।"

2. मुख्य वाक्य का कर्म (⟪कर्म⟫) आसन्न वाक्य द्वारा अधिक स्पष्ट किया जाता है:

⟪यो⟪ब्राह्मणो⟪देवान्यजते⟪तं⟪देवा⟪रक्षन्ति⟫ = "देवता उन ब्राह्मण की रक्षा करते हैं जो उन्हें यज्ञपति के रूप में अर्पित करता है।"

3. मुख्य वाक्य की संज्ञा का अधिक स्पष्टीकरण आसन्न वाक्य में होता है:

⟪ये⟪नराः⟪पापं⟪कुर्वन्ति⟪तेषां⟪पुत्रा⟪धनं⟪न⟪लभन्ते⟫ = "दुष्ट कर्म करने वाले पुरुषों के पुत्र धन प्राप्त नहीं करते।"

4. आसन्न सर्वनाम और संबंध शब्द अपादान कारक (⟪षष्ठी⟫) में होते हैं:

⟪यस्य⟪नरस्य⟪पुत्राः⟪पापं⟪कुर्वन्ति⟪स⟪न⟪सुखवान्⟫ = "वह पुरुष सुखी नहीं है जिसके पुत्र दुष्ट कर्म करते हैं।"

5. आसन्न सर्वनाम और संबंध शब्द करण कारक (⟪तृतीया⟫) में होते हैं:

⟪येन⟪शत्रुणा⟪ग्रामो⟪जितस्तं⟪द्विषन्ति⟫ = "वे शत्रु से घृणा करते हैं जिसने उनके गाँव को पराजित / जीता है।"

6. आसन्न सर्वनाम और संबंध शब्द सम्प्रदान कारक (⟪द्वितीया⟫) में होते हैं:

⟪यं⟪नरं⟪देवी⟪रक्षति⟪स⟪सुखमाप्नोति⟫ = "देवी द्वारा रक्षित पुरुष सुख प्राप्त करता है।"

19.2. आसन्न सर्वनाम = ⟪व्यपेक्षकसर्वनाम⟫ नपुंसकलिङ्ग।

⟪यद्⟫ "जो, जो, जिस" ⟪तद्⟫ के समान विभक्ति में होता है, लेकिन नियमित संधि के साथ।

पुल्लिंग
⟪पुंस्
नपुंसकलिङ्ग
⟪नपुंसक
स्त्रीलिङ्ग
⟪स्त्री
एकवचन
⟪एकवचन
1. सम्प्रदान
⟪प्रथमा
yas
⟪यस्
yad
⟪यद्

⟪या
2. अपादान
⟪द्वितीया
yam
⟪यम्
yad
⟪यद्
yām
⟪याम्
3. करण
⟪तृतीया
yena
⟪येन
yena
⟪येन
yayā
⟪यया
6. सम्प्रदान
⟪षष्ठी
yasya
⟪यस्य
yasya
⟪यस्य
yasyās
⟪यस्यास्
बहुवचन
⟪बहुवचन
1. सम्प्रदान
⟪प्रथमा
ye
⟪ये
yāni
⟪यानि
yās
⟪यास्
2. कारक
⟪द्वितीया
yān
⟪यान्
yāni
⟪यानि
yās
⟪यास्
3. करण कारक
⟪तृतीया
yais
⟪यैस्
yais
⟪यैस्
yābhis
⟪याभिस्
6. संप्रदान कारक
⟪षष्ठी
yeṣām
⟪येषाम्
yeṣām
⟪येषाम्
yāsām
⟪यासाम्

समास के पूर्वपद में प्रत्यय ⟪यद्⟫ (संधि का ध्यान रखते हुए) प्रकट होता है।

19.3. शब्दावली

⟪अर्थ⟫ पुं.: उद्देश्य, लक्ष्य, अर्थ (शब्द का), धन, संपत्ति, सम्पदा। ⟪अर्थम्⟫ (कारक), ⟪अर्थेन⟫ (करण) संप्रदान के साथ या उत्तरपद के रूप में: ... के लिए, ... करने हेतु।

⟪अर्थ⟫ तीन जीवन उद्देश्यों (⟪पुरुषार्थ⟫) में से एक है, जैसा कि पारंपरिक और धार्मिक साहित्य में वर्णित है:

⟪धर्म⟫ पुं.: धर्म के अनुसार कृत्य करने से पुरुषार्थ की प्राप्ति, या कम से कम अधर्म के परिणामस्वरूप होने वाले बुरे कर्मों से बचना

⟪अर्थ⟫ पुं.: उद्देश्यपरक व्यवहार, समृद्धि की प्राप्ति

⟪काम⟫ पुं.: इंद्रिय सुख, विशेष रूप से यौन क्षेत्र में भी


चित्र: ⟪कामः
⟪कामसूत्र⟫ का चित्रण
(चित्र स्रोत: विवरण)

⟪स्था⟫ 1 पुरुष ⟪तिष्ठति⟫ कर्मणि लुट् ⟪स्थीयते⟫ कृदंत ⟪स्थित⟫ : खड़ा होना, रहना, बना रहना, स्थित होना। (पारंपरिक रूप से इसे प्रथम वर्ग के अंतर्गत गिना जाता है, हालांकि यह एक अनुनासिक विषम वर्ग का अंतर्गत है, जैसे ⟪पा⟫ 1 ⟪पिबति⟫)

⟪स्था⟫ + ⟪उप⟫ 1 उट् ⟪उपतिष्ठति⟫ : आगे बढ़ना, किसी के सामने विनम्र भाव से खड़ा होना

⟪स्था⟫ + ⟪प्र⟫ 1 आत्मनेपद ⟪प्रतिष्ठते⟫ : चलना, चले जाना

⟪स्था⟫ से:

⟪स्थान⟫ न.: स्थान, (सही) जगह, ठिकाना

⟪स्थिति⟫ स्त्री.: रुकना, स्थिरता, अडिग रहना

⟪गर्भ⟫ पुं.: गर्भाशय, उदर, आंतरिक भाग, भ्रूण / शिशु। बहवीरीही के अंत में अक्सर: "आंतरिक भाग", उदाहरण के लिए,

⟪धनगर्भ⟫ 3: "जिसका आंतरिक भाग धन है = जिसमें धन स्थित है"

⟪गर्भगृह⟫ न.: हिंदू मंदिर का सबसे आंतरिक पवित्र कक्ष, जिसमें मंदिर के प्रमुख देवता की प्रतिमा होती है (हिंदू मंदिरों के निर्माण के लिए देखें: वोलवासन, ए.: भारत : हिंदू, बौद्ध और जैन निर्माण। -- म्यूनिख, 1968)


चित्र: ⟪गर्भगृहम्
बडामी (ಬದಾಮಿ)
(चित्र स्रोत: विवरण)

⟪वारिद⟫ पुं.: जलदाता = वर्षा मेघ


चित्र: ⟪वारिदः
गोवा (⟪गोंय⟫)
(चित्र स्रोत: विवरण)

⟪वा⟫ 2 पुरुष ⟪वाति⟫ कर्मणि लुट् ⟪वायते⟫ कृदंत ⟪वान⟫ / ⟪वात⟫ : चलना, बहना

इससे:

⟪वात⟫ पुं.: वायु

⟪वह्⟫ 1 उट् ⟪वहति⟫ कर्मणि लुट् ⟪उह्यते⟫ कृदंत ⟪ऊढ⟫ : ले जाना, चलाना (सकर्मक)

⟪छत्त्र⟫ न.: छतरी, छाता


चित्र: ⟪छत्त्रम्
"Onappottan (ഓണപ്പൊട്ടന്‍), पारंपरिक वेशभूषा में, केरल के दक्षिणी भागों में एक रीति है। Onappottan onam के दौरान घरों का दौरा करता है और आशीर्वाद देता है। हाल ही में onappottan एक दुर्लभ दृश्य बन गया है, जो गांवों तक सीमित है।"
(चित्र स्रोत: विवरण)

⟪पण्डित⟫ पुं.: विद्वान, ऋषि ; 3: बुद्धिमान, परिचित (में)


चित्र: ⟪पण्डितः⟪जवाहरलाल⟪नेहरू
⟪१९५९
(चित्र स्रोत: विवरण)

⟪सेव्⟫ १ आ ⟪सेवते⟫ प्.पु. ⟪सेव्यते⟫ पु.पा. ⟪सेवित⟫ : निवास करना, आबाद करना (अक., लोक.) ; भेंट करना, जाना (अक.) ; सेवा करना, पालन करना, पूजा करना ; अभ्यास करना, उपयोग करना ; साथ देना, यौन संबंध बनाना

⟪नि⟫ पूर्वपद: नीचे, अंदर

⟪सेव्⟫ + ⟪नि⟫ १ आ ⟪निषेवते⟫ : निवास करना, आबाद करना, भेंट करना

⟪अमुत्र⟫ : वहाँ, परलोक में

⟪इह⟫ : यहाँ, इस लोक में

⟪विद्⟫ ६ उ ⟪विन्दति⟫ प्.पु. ⟪विद्यते⟫ पु.पा. ⟪विन्न⟫ / ⟪वित्त⟫ : मिलना

⟪भार्या⟫ स्त्री.: प्राप्त करने योग्य = पत्नी

⟪प्रिय⟫ ३: प्रिय, सुखद

⟪मित्र⟫ न. (!): मित्र

⟪बान्धव⟫ पुरुष: संबंधी

⟪हि⟫ : क्योंकि, हाँ वास्तव में (कथन के आरंभ में कभी नहीं खड़ा हो सकता)

19.4. अभ्यास

संस्कृत में अनुवाद करें:

१. वैश्य की पत्नी, जिसका पुत्र मृत हो गया है, रो रही है।

२. राम उस देवता को यज्ञ करते हैं जो उनकी रक्षा करता है।

३. कवि क्षत्रिय की प्रशंसा करते हैं, जिसके धन को वे चाहते हैं।

४. अग्नि का यज्ञ नहीं करने वाले पुरुष के घर को आग जला देती है।

५. तृणारि पुरुष राम को पराजित करने वाले क्षत्रिय योद्धाओं को मार गिराता है (कर्मवाच्य)।

19.5. ⟪सुभाषितानि

अनुवाद करें:

⟪येन⟪येन⟪च⟪वातेन
⟪वारिदो⟪वारि⟪मुञ्चति⟪।
⟪तेन⟪तेन⟪च⟪वातेन
⟪छत्रं⟪वहति⟪पण्डितः⟪॥१॥

व्याख्या: ⟪वारि⟫ नाम., अक. एकवचन ⟪वारि⟫ न.: जल

⟪यो⟪धर्ममर्थं⟪कामं⟪च
⟪यथाकालं⟪निषेवते⟪।
⟪धर्मार्थकामसंयोगं
⟪सो⟪ऽमुत्रेह⟪च⟪विन्दति⟪॥२॥

व्याख्या: ⟪यथाकालम्⟫ अव्ययीभाव समास: सही समय पर ; हमेशा, जब इसके लिए सही समय उपलब्ध हो।

⟪सा⟪भार्या⟪या⟪प्रियं⟪ब्रूते
⟪स⟪पुत्रो⟪यस्तु⟪जीवति⟪।
⟪स⟪जीवति⟪गुणो⟪यस्य
⟪धर्मो⟪यस्य⟪स⟪जीवति⟪॥३॥

⟪यस्यार्थास्तस्य⟪मित्राणि
⟪यस्यार्थास्तस्य⟪बान्धवाः⟪।
⟪यस्यार्थाः⟪स⟪पुमांल्लोके
⟪यस्यार्थाः⟪स⟪हि⟪पण्डितः⟪॥४॥

व्याख्या: ⟪पुमान्⟫ एकवचन नाम. ⟪पुंस्⟫ "पुरुष" के ; ⟪लोके⟫ एकवचन लोक. ⟪लोक⟫ पुरुष.: ... में

Tüpfli's Global Village Library का हिस्सा