पाठ 45
A) संस्कृत में अनुवाद करें (भूतकाल के लिए अतिप्रीत प्रयोग करें):
१. सङ्घं भिनत्सि ॥ १ ॥
तुम बौद्ध मण्डल को तोड़ते हो।
२. किं महीमभुङ्क्त ॥ २ ॥
क्या तुमने पृथ्वी का आनंद लिया?
३. किं राज्ञो दानमादत्थाः ॥ ३ ॥ (अथवा: ... राज्ञा ...)
क्या तुमने राजा से दान प्राप्त किया?
४. साधो कस्माद्भयेभ्यो न बिभेषि ॥ ४ ॥
हे पवित्र पुरुष, तुम विपदाओं से क्यों नहीं डरते?
५. पितः कुत्र गच्छन्कुलं जहासि ॥ ५ ॥
पिता, कहाँ जाते हुए तुम परिवार को छोड़ देते हो?
६. शूद्रे ऽपि धनिनो ब्राह्मणस्य गृहं भारमबिभः ॥ ६ ॥
शूद्रा, क्या तुमने धनी ब्राह्मण के घर भार उठाया?
७. देवि कृतपुण्यस्य वैश्यस्य सुखेष्टिं पिपूर्याः ॥ ७ ॥
देवी, तुम्हें पुण्यवान वैश्य के सुख की इच्छा पूरी करनी चाहिए।
८. हस्तिनो बन्धनानि न भञ्ज्यात ॥ ८ ॥ (अथवा: ... न भिन्द्यात ॥)
हाथियों, तुम बंधन नहीं तोड़ना चाहिए।
९. नरसिंह कस्माद्ब्रह्मणि न समादधासि ॥ ९ ॥
हे सिंहसमान पुरुष, तुम अपने मन को पूर्णतः परम तत्व पर क्यों नहीं केंद्रित करते?
१०. कवे कच्चिल्लोकानमिमीथाः ॥ १० ॥
क्या तुम, हे कवि, संसारों को मापा?
अभ्यास पाठ
B) अनुवाद करें:
१. अर्जुन हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीं । तस्माद्भवता योध्यम् ॥ १ ॥
अर्जुन, या तो तुम मारे जाओगे और स्वर्ग प्राप्त करोगे, या तुम विजय प्राप्त करोगे और पृथ्वी का आनंद लेंगे। इसलिए तुम्हें लड़ना चाहिए (तुम्हें लड़ना ही है)।
२. भवति कथमनन्तदुःखमरुणत् ॥ २ ॥
आचार्य, आपने अनंत दुख को कैसे समाप्त किया?
३. ब्राह्मण किमग्नौ घृतमजुहोः ॥ ३ ॥
ब्राह्मण, क्या आपने यज्ञाग्निको घी डाला?
४. शत्रो शस्तेण जीवं न छिनत्सि ॥ ४ ॥
शत्रु, तुम खड्ग से आत्मा (जीवन) को नहीं चीरते।

अभ.: हस्तिनो बन्धनानि न भञ्ज्यात । भिन्द्यात
(छवि स्रोत: विवरण)
