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रूप-रंग
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A) निम्नलिखित वाक्यों में कोष्ठक में दिए शब्दों का संबंधित रूप भरें और अनुवाद करें:
१. राज्ञि (या: राजनि) धर्मं रक्षत्यभया जनाः ॥ १ ॥ (राजन्)
यदि राजा धर्म और प्रथा की रक्षा करता है, तो जनता भयमुक्त होती है।
२. आसीद्राजपुत्रो गौतमो नाम सुकृतकर्मोपपन्नो बुद्ध्या रूप्यमितबलः ॥ २ ॥ (नामन्)
एक राजकुमार था — उसका नाम गौतम था — उसने अपने कर्तव्यों को अच्छे से पूरा किया, वह प्रज्ञावान, सुंदर और अमाप शक्ति से युक्त था।
३. राज्यस्य सीमस्वरयो राजानं योद्धुं तिष्ठन्ति ॥ ३ ॥ (सीमन् — सप्तमी बहुवचन)
राज्य की सीमाओं पर शत्रु राजा को युद्ध करने के लिए खड़े हैं।
४. वैश्यानां कानि नामानि ॥ ४ ॥ (नामन्)
वैश्यों के क्या नाम हैं?
५. वैश्याः किंनामानः ॥ ५ ॥ (किंनामन्)
वैश्य कौन से नाम धारण करते हैं?
६. कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त इति भगवद्गीतायाम् ॥ ६ ॥ (कर्मन् — सप्तमी एकवचन)
"जो कर्म में अकर्म को देखता है और अकर्म में कर्म को, वह मनुष्यों में प्रज्ञवान है, वह योगी है" — यह भगवद्गीता में कहा जाता है।
७. किं कर्म किमकर्मेति कवयो ऽप्यत्र मोहिताः ॥ ७ ॥ (कर्मन्)
कवि भी इस बात में भ्रमित हैं कि कर्म क्या है और अकर्म क्या है।
८. ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न लुभ्यति ॥ ८ ॥ (प्रसन्नात्मन् — प्रथमा एकवचन)
जो परब्रह्म बन गया है और जिसका मन शांत है, वह शोक नहीं करता और कामना नहीं करता।
९. कर्मणः सुकृतस्य सुफलमाहुः ॥ ९ ॥ (कर्मन् — षष्ठी एकवचन)
कहा जाता है कि अच्छी की गई कर्म अच्छा फल देती है।
१०. महीभोगो राज्ञां धर्मः ॥ १० ॥ (राजन् — षष्ठी बहुवचन)
संसार का भोग करना राजाओं का कर्तव्य है।
११. राज्ञे बलिनो हस्तिनो दीयेरन् ॥ ११ ॥ (बलिन्, हस्तिन्)
बलवान हाथियों को राजा को देना चाहिए।
१२. ब्रह्मणा लोका असृज्यन्त ॥ १२ ॥ (ब्रह्मन् — तृतीया एकवचन)
ब्रह्मा द्वारा लोकों की सृष्टि की गई।
१३. आत्मना कृतं पापमात्मनाकृतं पापम् ॥ १३ ॥ (आत्मन् — तृतीया एकवचन)
स्वयं तो बुराई करता है, स्वयं ही बुराई से विरत रहता है।
१४. सद्भी राजभिर्जनेभ्यो ऽभयं दीयते ॥ १४ ॥ (राजन्)
अच्छे राजजन को भयमुक्ति प्रदान करते हैं।
१५. राजसु धर्मं न रक्षत्सु सभया जनाः ॥ १५ ॥ (राजन्)
यदि राजा धर्म और प्रथा की रक्षा नहीं करते, तो जनता भय से परिपूर्ण होती है।

अभ.: राज्ञे बलिनो हस्तिनो दीयेरन्
(चित्र स्रोत: विवरण)
मूढानां चेष्टितानि प्रायेण विनोदावहानि । यथा हि — एकदा दश मूढा देशाटनाय प्रस्थिताः । किञ्चिद्दूरं गतानां तेषामुपस्थिता काचिदगाधा नदी । बाहुभ्यां तरन्तस्ते कथमपि नदीं तीर्त्वा पारं गताः ॥
आसीत्तेषां मध्ये कश्चन वृद्धः । स किं सर्वे तीरमनुप्राप्ता ईति जिज्ञासमानस्तानेकैकशो गणयामास । परं नवैव परिगणितास्तेन । ततः स आक्रोशत् । अहो वयम् दश प्रस्थिताः । इदानीं नवैव स्मः । नूनमस्माकमेको नद्यां निमग्नः । गवेषयत तमिति । ततस्तेषामेकैको ऽपि गणनां चकार । परं नवैव दृश्यन्ते । ततस्तेषां व्याकुलीभूतानां महान्कोलाहलः समजनि । तत्रैव नातिदूरे कस्यचिदृषेराश्रमो ऽवर्तत । तत्र वसन्नृषिस्तेषां विवेष्टितमवलोक्योच्चैर्जहास । तस्य हासशब्दं श्रुत्वा मूढास्तरसा समुपसृत्य हासकारणमपृच्छन् । ऋषिराह । अहो । अनात्मज्ञा यूयम् । युष्माकमेकैको ऽपि नात्मानमगणयत् । तेनायं व्यामोहः संजात इति । तदाकर्ण्य ते मूढाः सलज्जमधोमुखाः प्रययुः ॥ (संस्कृतप्रथमादर्शः)
अनुवाद:
दस मूर्ख। मूर्खों की क्रियाएँ आमतौर पर मनोरंजक होती हैं। उदाहरण के लिए: एक बार दस मूर्ख यात्रा पर निकले, ताकि देश में घूमें। जब वे थोड़ी दूर चल चुके थे, तो एक गहरा नदी उनके रास्ते में आ गई। हाथों से तैरते हुए, उन्होंने किसी तरह नदी पार की और दूसरे किनारे पर पहुँच गए।
उनमें एक वृद्ध था। उसने जानना चाहता था कि क्या सभी किनारे पर पहुँच गए हैं, इसलिए उसने प्रत्येक को गिना। लेकिन उसने केवल नौ गिने। तब उसने चिल्लाया: "अरे! हम दस निकले थे, अब हम केवल नौ हैं! निश्चित रूप से एक व्यक्ति नदी में डूब गया है! उसकी खोज करो!" इसके बाद, प्रत्येक ने स्वयं को गिना। लेकिन हमेशा केवल नौ ही थे! तब वे उत्तेजित हो गए और एक बड़ा शोर मच गया। उस जगह से थोड़ी दूर एक ऋषि का आश्रम था। वहाँ रहने वाले ऋषि ने उनकी क्रिया को देखकर जोर से हँसा। मूर्खों ने उसकी हँसी सुनी, उसके पास दौड़े और कारण पूछा। ऋषि ने कहा: "हा! तुम स्वयं को नहीं जानते। प्रत्येक ने स्वयं को गिनने की भूल की है। इसलिए यह भ्रम उत्पन्न हुआ।" जब उन्होंने यह सुना, तो मूर्ख शर्मिंदा होकर, सिर झुकाए हुए चले गए।