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Α) Ἀπόκρισαι ταῖς ἐπομέναις ἐρωτήσεσιν ἑλληνιστί, χρώμενος τοῖς ἐν παρενθέσεσι δεδομένοις ὀνόμασιν:
१. कस्मै ब्राह्मण्यन्नं ददौ ॥ १ ॥ (भिक्षु, बाला, दास, भगवन्त्)
२. क आर्यसत्यान्यजानात् ॥ २ ॥ (बुद्ध, शाक्यमुनि)
३. कुत्राग्निश्चीयते ॥ ३ ॥ (यज्ञस्थान, मही)
४. कदा ब्राह्माणा घृतमग्नौ जुह्वति ॥ ४ ॥ (यज्ञकाल, देवान् स्तुत्वा)
५. कस्मान्मतिमतयः पुण्यं चक्रुः ॥ ५ ॥ (स्वर्गलोभ, नरकभय, भीतनरकता)
६. किमेव शस्त्रं छिनत्ति ॥ ६ ॥ (शरीर, अजीव)
७. किंकामः शत्रुरार्यैः सह युयुधे ॥ ७ ॥ (धनं जि)
८. कया भिक्षुरादितः ॥ ८ ॥ (गुणवती शूद्रा)
९. कुतः सुपुनर्भवं गम्यते ॥ ९ ॥ (कृतपुण्यत्व, सुनीति)
१०. केन शूद्रा न काम्येत ॥ १० ॥ (द्विजाति, ब्राह्मण, साधु)
११. किमर्थं सुगतो ऽगारादनगार्यं प्रवव्राज ॥ ११ ॥ (दुःखमोक्ष, मोक्षनयन्ती प्रज्ञा)
१२. कस्याः पुत्रः कृष्ण आसीत् ॥ १२ ॥ (देवकी)
१३. क्व मर्तुं सज्जना इच्छन्ति ॥ १३ ॥ (काशी = वाराणसी)
१४. केषां धर्मो वेदाध्ययनम् ॥ १४ ॥ (द्विज, द्विजाति, आर्य)
१५. कैर्वेदः प्रोक्तः ॥ १५ ॥ (ऋषि)
१६. कस्मिञ्जात आर्यः सुखमाप्नोति ॥ १६ ॥ (पुत्र)
१७. का नरा लुभ्यन्ति ॥ १७ ॥ (सुरूपशरीरा, देवीरूपा)
१८. के नराः सुरूपा लुभ्यन्ति ॥ १८ ॥ (समोह, बुद्धिमन्त्)
१९. कस्या इन्द्रः पुत्रं दास्यति ॥ १९ ॥ (सुमतिब्राह्मणी)
Β) Μεταφραστε:
१. किं स्थितप्रज्ञः प्रव्रजेत्किमगारे पुत्रेषु वसेत् ॥ १ ॥
Εαν τις, ου η διαγνωσις εστιρεως θεμελιωθεις, εις την αναρχιαν εισεληλυθεν, η εν τη οικια παρα τοις υιοις μενει;
२. अपि गुरुः सत्यं जानाति ॥ २ ॥
Γινωσκει και ο διδασκαλος την αληθειαν;
३. कच्चिच्छुद्रा द्विजदासाः ॥ ३ ॥
Ειναι οι Σουδρας οπως δουλων των δις γεγενημενων;
४. कच्छिच्छुद्रो भारमाबिभः ॥ ४ ॥
Εφερεν ο Σουδρας οπως το βαρος;
Γ) Οριστε και μεταφραστε τα εξης συνθετα:
| Συνθετον | Σημασια | Εξηγησις |
|---|---|---|
| अतिमात्रम् | υπερβολικως | मात्रामतीत्य (υπερ το μετρον) |
| अतिवसन्तम् | μετα τον εαρα | वसन्तमतीत्य (μετα τοτελη του εαρος) |
| अधिहरि | εν Χαρα | हरौ (εν Χαρα) |
| अधिकेरलम् | εν Κεραλα | केरेलेषु (εν Κεραλα) |
| अनुरूपम् | αναλογως | रूपस्य योग्यम् (τη μορφη αναλογον) |
| अनुदिनम् | ημερον | दिने दिने (ημερα ημεραν) |
| अनुगङ्गम् | παρτα Γanges | गङ्गाया अनु (παρτα Γanges) |
| अनुविष्णुम् | μετα Βισνου | विष्णोः पश्चात् (οπισω/μετα Βισνου) |
| अपविष्णुम् | χωρις Βισνου | विष्णोः पृथक् (μακραν Βισνου) |
| अभिमुखम् | απεναντι | मुखमभि (εις το προσωπον) |
| अभ्यग्नि | προς το πυρ | अग्निमभि (εις την κατευθυνσιν του πυρος) |
| आबालवृद्धम् | εκ παιδων εως γερων | आ बालेभ्यश्च वृद्धेभ्यश्च (συμπεριλαμβανομενου...) |
| आमरणम् | εως θανατου | आ मरणात् (εως του θανειν) |
| उपवृक्षम् | παρτα το δένδρον | वृक्षस्य समीपे (εγγυς του δενδρου) |
| यथास्थानम् | εν τη δεξια τοπω | स्थानमनतिक्रम्य (τοπον μη υπερβαινοντος) |

Εικ.: पुत्रे जात आर्यः सुखमाप्नोति
(Πηγη εικονος: Λεπτομερειαι)
Μεταφραστε εις Σανσκριτον, χρησιμοποιων αποκλειστικως ρηματικας μορφας του παρακειμενου:
एकदा कश्चिद्वृद्धो ग्रामान्तरं गच्छन्पथि श्रान्तो बभूव । अतः स विश्रमाय पार्श्वस्थितस्य चूततरोर्मूलं जगाम ॥ तस्मिन्वृक्षे पचेलिमानि फलानि ववृतिरे । वृद्धस्य तेषु स्पृहा जज्ञे । परं स वृक्षमारुह्य तानि ग्रहीतुं न शेकुः ॥ दिष्ट्या तस्मिन् तरौ केचिद्वानराः फलानि खादन्तः तस्थुः । तानवलोक्य वृद्धः प्रहर्षं जगाम । स किमकरोत् । स कतिचिदुपलानादाय वानरांल्लक्ष्यीकृत्य प्रसिसिषे । वानराः कुपिताः कानिचित्फलान्यवचित्य वृद्धं प्रति प्रसिसिषुः । वृद्धः सहर्षं तान्यादाय स्वाभीष्टदेशं जगाम ॥ अहो वृद्धस्य कौशलम् ॥